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Tuesday, 18 December 2018

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा और व्रत पूजा विधि

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा


मोक्षदा एकादशी व्रत कथा 

भगवान कहते हैं इस एकादशी का एक दिन का पुण्य प्राणी को नरक से मुक्ति प्रदान करने वाला है। इस संदर्भ में लीलाधारी श्रीकृष्ण ने जो कथा धर्मराज युधिष्ठिर को सुनायी वह यहां उल्लेख करने योग्य है। भगवान कहते हैं एक थे राजा वैखानस उनके राज्य में सभी सुख शांति से रहते थे। योगी, मुनी, सिद्ध संत सहित सभी जीव जन्तु बिना किसी भय के अपने अपने कर्म किया करते थे। इस प्रजापालक राजा ने एक रात स्वप्न में देखा कि पिता नर्क की यातनाएं भोग रहे हैं। राजा अपने पिता की यह दशा देखकर बेचैन हो उठा और सारी रात फिर सो नहीं सक। सुबह क्षितिज पर सूर्य की लालिमा दिखते ही वह ज्ञानी पंडितों के पास पहुचा और जो कुछ स्वप्न में देखा था कह सुनाया।

राजा की बातें सुनकर पंडितों ने उन्हें त्रिकालदर्शी ऋषि पर्वत के पास जाने की सलाह दी। राजा पर्वत की कुटिया में जा पहुंचा और विनम्रता पूर्वक उनसे अपनी समस्या कह डाली। राजा की अधीरता और बेचैनी को देखकर महाज्ञानी पर्वत ने उन्हें बताया कि आपके पिता अपनी एक ग़लती की सजा भोग रहे हैं। उन्हें नर्क से मुक्त कराने के लिए आपको मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी मोक्षदा एकदशी करनी चाहिए। इस एकादशी का पुण्य आप अपने पिता को देवें तो आपके पिता नर्क से छूट सकते हैं। राजा ने विधि पूर्वक एकादशी का व्रत किया और प्राप्त पुण्य को पिता को अर्पित कर दिया। राजा वैखानस के पिता इस पुण्य से नर्क से मुक्त हो गये और स्वर्ग में उन्हें स्थान प्राप्त हुआ।

* मोक्षदा एकादशी व्रत पूजा विधि *

मोक्षदा एकादशी का व्रत किस प्रकार करना चाहिए इसके विषय में श्री कृष्ण कहते हैं। दशमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और शुद्ध मन से भगवान दामोदर का नाम स्मरण करते हुए सो जाना चाहिए।
सुबह ब्रह्म मुर्हूर्त मे उठकर स्नान करें। भगवान की प्रसन्नता के लिए धूप, दीप, तिल, तुलसी की मंजरी, पंचामृत से लक्ष्मी पति श्री विष्णु की पूजा करें। 
पूजा के पश्चात विष्णु के अवतारों एवं उनकी कथाओं का श्रवण या पाठ करें। रात्रि जागरण कर भगवान विष्णु का भजन गायें। द्वादशी के दिन अपने सामर्थ्य के अनुसार पंडितों को भोजन कराएं व दक्षिणा सहित उन्हें विदा करें। 
अब आप स्वयं अन्न जल ग्रहण करें। इस प्रकार मोक्षदा एकादशी करने से जो पुण्य की प्राप्ति होती है वह वाजपेय यज्ञ से भी अधिक पुण्य देने वाला है।

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